कैसे करें मशरूम का व्यावसायिक उत्पादन,

in #bitcoin8 years ago

): कृषि सहायक व्यवसायों में मशरुम की खेती भी आज कल रोजगार का अच्छा साधन बनती जा रही है। मशरुम में प्रोटीन, विटामिन्स, फॉलिक एसिड व मिनरल्स काफी मात्रा में होते हैं। यह आयरन का भी अच्छा श्रोत मानी जाती है। यही कारण है कि व्यंजनों में इसकी बढ़ती मांग ने आज के दौर में इसे काफी प्रचाललित कर दिया है।

वैसे तों भारत में मशरूम का प्रचलन लगभग 200 वर्षों से होता आया है। लेकिन इसकी व्यावसायिक खेती की शुरुआत कुछ ही वर्ष पहले मानी जाती है। पहले इसकी खेती हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित थी। लेकिन अब मशरूम की खेती ने पहाड़ों से नीचे उतर कर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में भी स्थान बना लिया है।

हालांकि सफ़ेद बटन मशरुम की सबसे अधिक खेती होती है, लेकिन इसके अलावा भी ढिंगरी आदि इसकी कई किस्में देखने में आती हैं।

क्या है मशरूम का सीजन?

वैसे तो नियंत्रित परिस्थितियों में सारा साल मशरूम की खेती की जा सकती है, लेकिन अक्तूबर से मार्च तक इसे लगभग कहीं भी उगाया जा सकता है। हालांकि समशीतोष्ण क्षेत्रों जैसे, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाके,तमिलनाडु के पहाड़ी इलाके और पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाके ऐसे क्षेत्र हैं जहां सारा साल बटन मशरुम की दो से तीन फसलें पैदा होती हैं। पश्चिमोत्तर मैदानी इलाकों में अधिकतर मौसमी उत्पादक ही लिया जाता है जोकि शीतकालीन फसल के रूप में होता है। इन दिनों देश में शादियों का सीजन अधिक होने के कारण इसकी मांग भी अच्छी रहती है।

कैसे करें मशरुम की खेती?

बीज: हालांकि मशरूम का बीज बाजार में तैयार भी मिलता है, लेकिन इसे किसान अपने स्तर पर भी तैयार कर सकते हैं और व्यावसायिक तौर पर बेच भी सकते हैं।

कम्पोस्ट: गेहूं और भूसी/ पुआल का इस्तेमाल कम्पोस्ट बनाने के लिए किया जाता है। इसमें कई तरह के जैविक और अजैविक तथा नाइट्रोजन पोषक तत्व पोषक तत्व मिलाए जाते हैं।

कम्पोस्ट का निर्माण 2 तरह से किया जा सकता है। जिनके पास पाश्चरीकृत करने की सुविधा है वो छोटी पद्धति अपना सकते हैं जबकि लंबी पद्धति में इसके तैयार करने की अवधि 28 दिन की होती है। इस अवधि में एक निश्चित अंतराल के बाद 7 से 8 बार कम्पोस्ट को पलटी दी जाती है (उलट-पलट किया जाता है)। गहरे-भूरे रंग, अमोनिया मुक्त, हल्की चिकनाहट वाले और 65-70 प्रतिशत की नमी युक्त कम्पोस्ट को अच्छा कम्पोस्ट माना जाता है। इस तरह से तैयार कम्पोस्ट में 3 प्रकार से मशरुम के बीज मिलाए जा सकते हैं। 35 किलोग्राम कम्पोस्ट के लिए एक बोतल बीज पर्याप्त होता है जो कि 0.75 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैलाया जा सकता है। बीज और कम्पोस्ट का अनुपात 0.5 फीसदी रखा जाता है। कम्पोस्ट में बीज मिलने के बाद उसे ट्रे में फैलाकर कमरे/ झोंपड़ी में रखा जाता है और उसे पुआल अथवा किसी हल्की चीज से ढंक दिया जाता है। कमरे का तापमान करीब 18 डिग्री सेंटीग्रेड और नमी की मात्र 95 प्रतिशत होनी चाहिए।

बुवाई के 30-35 दिनों में मशरुम कम्पोस्ट से ऊपर नजर आने लगती है। जब यह पूर्ण विकसित हो जाये तो फल वाला हिस्सा तोड़ लिया जाता है। एक वर्गमीटर में एक फसल चक्र के दौरान 10 किलोग्राम मशरुम पैदा हो सकती है।

तुड़ाई का काम अक्सर दोपहर के बाद किया जाता है और तुड़ाई के बाद मशरूम की जड़ों वाले गंदे भाग को साफ चाकू से काटा जाता है और मशरूम के बटन (फल) को एक विशेष कैमिकल युक्त पानी में धोया जाता है। इसके बाद बाजार की मांग के अनुसार उसे 100 ग्राम, 200 ग्राम, 500 ग्राम आदि की पैकिंगों में पैक किया जाता है व बाजार में भेज दिया जाता है।

मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार व प्रदेशों की सरकारों की ओर से कई योजनाएं चलाई जाती हैं। मशरूम से संबंधित सरकारी स्कीमों व इसकी खेती की विस्तृत जानकारी के लिए अपने न