काल निरंजन
काल निरंजन
अव्याकृत के अन्तर्गत चतुर्थ पाद-स्थूल में प्रणव ब्रह्म तथा गायत्री से परे सूक्ष्म (विद्यापाद) में काल निरंजन का स्थान है। शास्त्रों में इसे निरंजन पुरुष, काल पुरुष, काल निरंजन, काल भगवान, निरंजन शक्ति, महाकाल, महारुद्र, महत्तत्त्व आदि-आदि नामों से उल्लेखित किया गया है।
अथर्ववेद में इसे निम्नोक्त प्रकार कहा है। यथा:-
काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्।
कालो हि सर्वस्येश्वरो यः पितासीत् प्रजापतेः॥
— (अथर्ववेद)
अन्वयार्थ: काले तपः काले ज्येष्ठम् = काल (निरंजन शक्ति) ही तप है और काल ही आद्य ईश्वर स्वरूप है; काले ब्रह्म समाहितम् = काल में ही ब्रह्म का समावेश है; कालो हि सर्वस्येश्वरः = काल ही सभी-यावत् पदार्थों का ईश्वर रूप है; यः पितासीत् प्रजापतेः = काल, जो जगत पिता पदार्थों का ईश्वर रूप है; यः पितासीत् प्रजापतेः = काल, जो जगत पिता ब्रह्माजी का भी पिता है।
भावार्थ: सारी सृष्टि रचना की शक्ति-सामर्थ्य इसी काल-निरंजन पुरुष में है। इसी काल पुरुष के अन्तर्गत सृष्टि के अग्रज, सबसे ज्येष्ठ हिरण्यमय गर्भ नामक आदिपुरुष की वर्तमान उपस्थिती है। इसी अधिष्ठाता स्वरूप काल निरंजन पुरुष के अन्तर में सम्पूर्ण वेदों का बीज रूप है। यह जगत का ईश्वर भी है तथा यही काल पुरुष जगतकर्ता (पिता) ब्रह्माजी का जनक भी है।
पुनः महाभारते:-
⊹ कालः कर्ता विकर्ता च सर्वमन्यदकारणम्।
नाशं विनाशमैश्वर्यं सुखं दुःखं भावाभवौ॥
— (महाभारत, शा. पर्व)
अन्वयार्थ: कालः कर्ता विकर्ता च = काल ही करता है और वही बिगाड़ता भी है और; सर्वमन्यदकारणम् = अन्य सबका कार्य-कारण रूप यही है; नाशं विनाशमैश्वर्यम् = नाश-विनाश, ऐश्वर्यादि; सुखं दुखं भवाभवौ = दुःख-सुख, जन्म मरणादि सब इसी के द्वारा मिलते हैं।
भावार्थ: यह काल ही कर्ता है, यही बिगाड़ता है, यही नाश विनाश करता है। दुःख, सुख और ऐश्वर्य सब इसी के द्वारा मिलते हैं। इसके सामने इसके सिवाय किसी का जोर-बल नहीं चलता। यही काल विश्व में व्यापक हो रहा है। यह अग्नि की भाँति सबको समेट कर स्वयं भी अंतर्हित हो जाता है।
तारणम वाणी में कहा है:-
पेड़ काली किन ना देखी, सब छाया ही में रहे उरझाए।
गम छाया की भी ना पड़ी, तो पेड़ पार क्यों लखाए।।
— (सनंध, प्र.५/चौ. २१)
भावार्थ: अंधकार के समान पूर्ण, काल ही माया रूपी वृक्ष है, जिसके मूल- ‘काल निरंजन’ को किसी ने नहीं देखा। उसकी छाया या मोहतत्त्व में ही सब उलझे हुए हैं। जब मोहतत्त्व का ही पार नहीं सके, तब उसके मूल या पार की सुध कैसे हो ?
इसके अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत नामक तीन स्वभाव हैं।
१. अध्यात्म के साथ: चौबीस हजार शक्तियों सहित सुमना शक्ति रहती है। इसका स्वभाव इच्छा, क्रिया और ज्ञान है।
२. अधिदैव के साथ: चौबीस हजार शक्तियों सहित विद्या और ब्रह्मविद्या नाम की दो शक्तियाँ रहती हैं। इसका स्वभाव आवर्ण, विक्षेप और काल है।
३. अधिभूत के साथ: चौबीस हजार शक्तियों के साथ दस महाविद्या और ब्रह्माणी शक्ति रहती हैं। इसका स्वभाव असत्, जड़ और दुःख है।
इस प्रकार यहाँ अव्याकृत के सूक्ष्म स्थान में बहत्तर हजार मूल शक्तियाँ हैं। इनमें से प्रत्येक के तीन-तीन स्वभाव उपरोक्त प्रकार से हैं।
यही ७२००० शक्तियाँ ब्रह्माण्ड के पिण्डों में ७२००० नाड़ी रूप में हैं। इन्हीं शक्तियों के स्वतः प्रभाव से यह काल निरंजन शक्ति अत्यंत प्रबल-प्रचण्ड मानी गई है। असंख्य ब्रह्माण्ड के जीवों का यह महाकालरूप है। अतः सभी जीव यहीं आकर लीन हो जाते हैं। यही शक्ति अनेक ब्रह्माण्डों का नाश भी करती है और उन्हें अपने में समेट भी लेती है। असंख्य ब्रह्माण्ड के जीवों का यही 'ब्रह्म' है। आदिनारायण का सूक्ष्म-मोहतत्त्व इसी का प्रतिबिंब है। उसके जितने नाम गिनाए गए हैं, वे सभी मूलतः इसी के नाम हैं। यहाँ इसका निजस्वरूप मन, वचन और दृष्टि से परे निर्विशेष तथा अत्यन्त सूक्ष्म सुरता रूप में है। अतः इसे ‘‘नित्यं वाङ्मनसः परम्’’ कहा है। यह यहाँ अखण्ड के दरवाजे पर चौकी रूप है। यह किसी अनधिकारी जीव को अखण्ड में (यहाँ से आगे) जाने नहीं देती है।