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RE: धर्म का प्राणतत्व : विनय (भाग # २) | The Life of Religion : Modesty (Part # 2)

in #life8 years ago

बात तो आपकी सही ही है कि लोग हर चीज में वजह ही खोजते है कि ये ऐसा क्यों कह/कर रहा है इसका इसमें क्या स्वार्थ है इत्यादि. यही आज की वास्तविकता है. परन्तु फिर भी हमें अपने अच्छे कर्म करते रहना है जिसे जो सोचना है सोचे.

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जी हमे अपने अछे कार्य को कभी नहीं रोकना चाहिये कियो की इस संसार के बुरे लोग तो चाहते ही यही के की अछे काये रुक जाए.

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